राजनीति
विपक्ष में टूट के बाद संसद में एनडीए की ताकत बढ़ी, दो-तिहाई बहुमत की चर्चा तेज
तृणमूल कांग्रेस और शिवसेना के उद्धव गुट में टूट के बाद संसद का राजनीतिक गणित बदलता दिख रहा है। सत्ता पक्ष की संख्या मजबूत हुई है, लेकिन संविधान संशोधन जैसे बड़े विधेयकों के लिए दो-तिहाई समर्थन जुटाना अब भी बड़ी चुनौती बना हुआ है।
नई दिल्ली, 2 जुलाई 2026: देश की राजनीति में संसद के संख्या गणित को लेकर नई बहस शुरू हो गई है। तृणमूल कांग्रेस और शिवसेना के उद्धव गुट में टूट के बाद सत्तारूढ़ राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की स्थिति पहले से मजबूत मानी जा रही है। रिपोर्ट के अनुसार, इन राजनीतिक बदलावों से सरकार को लोकसभा में अतिरिक्त समर्थन मिल सकता है, लेकिन संविधान संशोधन जैसे बड़े विधेयकों को पारित कराने के लिए जरूरी दो-तिहाई बहुमत अभी भी पूरी तरह आसान नहीं है।
संसद में किसी साधारण विधेयक को पारित कराने की तुलना में संविधान संशोधन विधेयक को पारित कराना ज्यादा कठिन होता है। इसके लिए कुल सदस्य संख्या के बहुमत के साथ-साथ उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों के दो-तिहाई समर्थन की जरूरत होती है। इसी वजह से सरकार के लिए केवल सबसे बड़े गठबंधन के रूप में मजबूत होना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उसे सदन में मतदान के समय व्यापक समर्थन भी जुटाना होगा। रिपोर्ट में बताया गया है कि वर्तमान लोकसभा में यदि सभी सदस्य उपस्थित होकर मतदान करते हैं, तो दो-तिहाई समर्थन के लिए लगभग 360 मतों की जरूरत पड़ सकती है।
राजनीतिक रूप से यह मामला इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि सरकार परिसीमन और महिला आरक्षण से जुड़े कानूनों को आगे बढ़ाने की कोशिश कर सकती है। विपक्ष पहले भी ऐसे मुद्दों पर सरकार को चुनौती दे चुका है। अप्रैल में संविधान संशोधन से जुड़े एक प्रयास में सत्ता पक्ष को 298 मत मिले थे, लेकिन वह दो-तिहाई समर्थन से पीछे रह गया था। अब तृणमूल कांग्रेस और शिवसेना के उद्धव गुट से अलग हुए सांसदों के समर्थन की चर्चा ने सत्ता पक्ष की स्थिति को मजबूत किया है।
विपक्ष के लिए यह स्थिति चिंता का विषय है। तृणमूल कांग्रेस, शिवसेना का उद्धव गुट, आम आदमी पार्टी और अन्य दलों में हुए राजनीतिक बदलाव विपक्षी एकता पर असर डाल सकते हैं। अगर विपक्षी दलों की संख्या घटती है या कुछ दल मतदान के दौरान अनुपस्थित रहते हैं, तो सरकार के लिए रास्ता आसान हो सकता है। वहीं, यदि विपक्ष एकजुट रहता है और छोटे दल भी उसके साथ खड़े होते हैं, तो सरकार को दो-तिहाई समर्थन जुटाने में कठिनाई आ सकती है।
आने वाले मानसून सत्र में यह संख्या गणित और भी महत्वपूर्ण हो सकता है। सरकार किन विधेयकों को लाती है, कौन-से दल समर्थन देते हैं, कौन-से दल विरोध करते हैं और कौन मतदान से दूर रहता है, इस पर संसद की दिशा निर्भर करेगी। फिलहाल सत्ता पक्ष पहले से मजबूत दिख रहा है, लेकिन दो-तिहाई बहुमत की मंजिल अभी भी पूरी तरह तय नहीं मानी जा सकती।
