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भारत के सेवा क्षेत्र की रफ्तार 17 महीने के निचले स्तर पर, मांग और भर्ती में नरमी
भारत के सेवा क्षेत्र की वृद्धि जून में धीमी पड़कर 17 महीने के निचले स्तर पर पहुंच गई। मांग में कमजोरी, नए कारोबार की धीमी रफ्तार और भर्ती लगभग ठहरने से अर्थव्यवस्था की गति को लेकर चिंता बढ़ी है।
नई दिल्ली, 3 जुलाई 2026: भारत के सेवा क्षेत्र की रफ्तार जून महीने में धीमी पड़ गई है। ताजा सर्वेक्षण के अनुसार, देश का सेवा क्षेत्र 17 महीने के सबसे कमजोर स्तर पर बढ़ा। एचएसबीसी इंडिया सर्विसेज क्रय प्रबंधक सूचकांक जून में घटकर 57.4 पर आ गया, जबकि मई में यह 59.8 था। हालांकि 50 से ऊपर का स्तर अब भी वृद्धि को दिखाता है, लेकिन सूचकांक में आई गिरावट यह संकेत देती है कि सेवा क्षेत्र की गति पहले जैसी मजबूत नहीं रही।
सेवा क्षेत्र भारत की अर्थव्यवस्था का बहुत बड़ा हिस्सा है। इसमें बैंकिंग, बीमा, होटल, रेस्टोरेंट, परिवहन, सूचना प्रौद्योगिकी, संचार, स्वास्थ्य, शिक्षा, व्यापार सेवाएं, पर्यटन और पेशेवर सेवाएं शामिल हैं। जब सेवा क्षेत्र की रफ्तार धीमी होती है, तो इसका असर केवल कंपनियों पर नहीं, बल्कि रोजगार, आय, उपभोक्ता खर्च और पूरे आर्थिक माहौल पर पड़ सकता है। यही कारण है कि जून का यह आंकड़ा कारोबार जगत और नीति निर्माताओं के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
सर्वेक्षण में सबसे बड़ी चिंता घरेलू मांग को लेकर दिखी। नए कारोबार की वृद्धि ढाई साल से अधिक समय में सबसे धीमी रही। इसका मतलब यह है कि कंपनियों को नए आदेश तो मिल रहे हैं, लेकिन उनकी रफ्तार पहले जैसी तेज नहीं है। कमजोर मांग का असर कई क्षेत्रों में दिखाई दे सकता है, खासकर उन कारोबारों पर जो घरेलू ग्राहकों और उपभोक्ता खर्च पर अधिक निर्भर हैं। यदि लोग खर्च कम करते हैं या कंपनियां नई सेवाओं की मांग घटाती हैं, तो सेवा क्षेत्र की वृद्धि पर दबाव बढ़ सकता है।
भर्ती के मोर्चे पर भी नरमी दिखाई दी। रिपोर्ट के अनुसार, कंपनियों ने कर्मचारियों की संख्या में बहुत कम वृद्धि की और केवल लगभग एक प्रतिशत कंपनियों ने अतिरिक्त कर्मचारियों को रखने की बात कही। यह स्थिति अप्रैल और मई में दिखी मजबूत भर्ती की तुलना में कमजोर है। अगर कंपनियां नए लोगों को नौकरी देने में सावधानी बरतती हैं, तो यह संकेत हो सकता है कि वे आने वाले महीनों में मांग को लेकर पूरी तरह आश्वस्त नहीं हैं।
हालांकि पूरी तस्वीर केवल नकारात्मक नहीं है। अंतरराष्ट्रीय मांग ने कुछ राहत दी है। नए निर्यात आदेश तीन महीने की सबसे तेज रफ्तार से बढ़े। इससे यह संकेत मिलता है कि विदेशी ग्राहकों की ओर से भारतीय सेवा कंपनियों को कुछ सहारा मिला है। सूचना प्रौद्योगिकी, कारोबारी सेवाएं, परामर्श और अन्य निर्यात आधारित सेवाओं के लिए यह सकारात्मक बात हो सकती है।
लागत के मोर्चे पर भी कंपनियों को कुछ राहत मिली है। बिजली, खाद्य पदार्थ, ईंधन और परिवहन जैसी लागतों में वृद्धि की रफ्तार कम हुई। इनपुट लागत मुद्रास्फीति पांच महीने के निचले स्तर पर रही। कंपनियों ने ग्राहकों पर कम बोझ डाला, जिससे सेवाओं की कीमतों में वृद्धि भी सात महीने के निचले स्तर पर पहुंच गई। यह उपभोक्ताओं के लिए राहत की बात हो सकती है, लेकिन कंपनियों के मुनाफे पर इसका असर उनकी लागत और मांग के संतुलन पर निर्भर करेगा।
कारोबारी भरोसे में भी कमी दर्ज की गई। कंपनियों ने प्रतिस्पर्धा, कठिन आर्थिक परिस्थितियों और रुपये की कमजोरी को चिंता का कारण बताया। समग्र क्रय प्रबंधक सूचकांक, जिसमें सेवा और विनिर्माण दोनों क्षेत्र शामिल होते हैं, मार्च के बाद सबसे कमजोर स्तर पर आ गया। इससे संकेत मिलता है कि निजी क्षेत्र में वृद्धि जारी है, लेकिन उसकी गति धीमी हो रही है।
कुल मिलाकर, जून का सेवा क्षेत्र आंकड़ा भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए सावधानी का संकेत देता है। वृद्धि अभी भी बनी हुई है, लेकिन मांग, नए कारोबार, भर्ती और कारोबारी भरोसे में नरमी दिख रही है। आने वाले महीनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि मानसून, उपभोक्ता खर्च, निर्यात मांग, ब्याज दरों और रुपये की चाल से सेवा क्षेत्र को कितना समर्थन मिलता है। यदि घरेलू मांग फिर से मजबूत होती है, तो सेवा क्षेत्र दोबारा गति पकड़ सकता है, लेकिन फिलहाल कारोबार जगत में सतर्कता बढ़ती दिख रही है।
