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जुलाई में मानसून सामान्य से कमजोर रहने की आशंका, खेती और पानी पर बढ़ी नजर

भारत में जून के दौरान बारिश की कमी के बाद जुलाई में भी मानसून सामान्य से कम रहने की आशंका जताई गई है। अगले 7 से 10 दिनों में बारिश बढ़ सकती है, लेकिन कृषि और जल संसाधनों पर नजर बनी रहेगी।

New DelhiTNT Bureau6 min read
भारत में मानसून बादलों के बीच खेतों में खरीफ फसल की तैयारी करते किसान

नई दिल्ली: देश में मानसून की रफ्तार और बारिश की मात्रा पर एक बार फिर सबकी नजर टिक गई है। जून में कमजोर बारिश के बाद जुलाई को लेकर भी सावधानी वाली तस्वीर सामने आई है। मौसम विभाग से जुड़े ताजा अनुमान के अनुसार, अगले 7 से 10 दिनों में अच्छी बारिश से देशभर की मौजूदा बारिश की कमी कुछ कम हो सकती है, लेकिन जुलाई में कुल मिलाकर कई हिस्सों में बारिश सामान्य से कम रहने की आशंका बनी हुई है।

भारत में जुलाई मानसून का सबसे महत्वपूर्ण महीना माना जाता है। यही वह समय होता है जब खरीफ फसलों की बुआई तेजी पकड़ती है। धान, सोयाबीन, कपास, दालें और कई अन्य फसलें मानसूनी बारिश पर निर्भर रहती हैं। खासकर मध्य भारत, पूर्वी भारत और वर्षा आधारित कृषि क्षेत्रों में जुलाई की बारिश किसानों के लिए बेहद महत्वपूर्ण होती है।

रिपोर्ट्स के अनुसार, देश में अभी बारिश की कमी काफी अधिक रही है। हालांकि मानसून के आगे बढ़ने और बंगाल की खाड़ी में कम दबाव का क्षेत्र बनने की संभावना से आने वाले दिनों में बारिश की गतिविधि बढ़ सकती है। इससे मध्य भारत और पश्चिमी हिस्सों सहित कई क्षेत्रों में खेतों को नमी मिलने और बुआई को सहारा मिलने की उम्मीद है।

मौसम विभाग ने संकेत दिया है कि मानसून अगले कुछ दिनों में दिल्ली, हरियाणा, पंजाब और राजस्थान के कुछ हिस्सों तक आगे बढ़ सकता है। उत्तर भारत के कई राज्यों में लोग गर्मी और उमस से राहत का इंतजार कर रहे हैं। मानसून की दस्तक से तापमान में कमी और मौसम में बदलाव देखने को मिल सकता है, लेकिन जुलाई में तापमान कई जगह सामान्य से अधिक रहने की संभावना भी बताई गई है।

कृषि के लिहाज से यह समय निर्णायक है। अगर जुलाई के पहले हिस्से में अच्छी बारिश होती है, तो बुआई की रफ्तार सुधर सकती है। लेकिन अगर बारिश लंबी अवधि तक कमजोर रहती है, तो किसानों को फसल चयन, सिंचाई और बुआई के समय को लेकर कठिन फैसले लेने पड़ सकते हैं। वर्षा आधारित क्षेत्रों में कम बारिश का असर सीधे खेत की नमी, बीज अंकुरण और शुरुआती फसल विकास पर पड़ता है।

जल संसाधनों पर भी मानसून की स्थिति का असर पड़ता है। जलाशयों, नदियों, भूजल और शहरी जलापूर्ति व्यवस्था के लिए मानसूनी बारिश बेहद जरूरी है। जून में बारिश कमजोर रहने से कई जगह जल स्तर और जल भंडारण पर दबाव बढ़ सकता है। अगर जुलाई में बारिश सामान्य से कम रहती है, तो राज्यों को पानी के प्रबंधन पर अतिरिक्त ध्यान देना पड़ सकता है।

कमजोर मानसून का असर केवल खेती तक सीमित नहीं रहता। ग्रामीण आय, खाद्य कीमतें, पशुपालन, बिजली मांग और बाजार की गतिविधियाँ भी इससे जुड़ती हैं। कम बारिश होने पर सिंचाई के लिए बिजली और डीजल की मांग बढ़ सकती है। दूसरी ओर, पर्याप्त बारिश होने पर किसान बुआई को लेकर ज्यादा आश्वस्त होते हैं और ग्रामीण बाजारों में गतिविधि तेज होती है।

मौसम विशेषज्ञों के अनुसार, मानसून कई वैश्विक और क्षेत्रीय कारकों से प्रभावित होता है। एल नीनो और इंडियन ओशन डाइपोल जैसे कारक बारिश के वितरण पर असर डाल सकते हैं। जून में कम दबाव प्रणाली नहीं बनने से बारिश की गतिविधि कमजोर रही। अब बंगाल की खाड़ी में बनने वाली संभावित प्रणाली आने वाले दिनों में बारिश को सहारा दे सकती है।

आम लोगों के लिए भी मौसम से जुड़ी सावधानी जरूरी है। शहरों में अचानक तेज बारिश से जलभराव, ट्रैफिक और बिजली आपूर्ति की समस्या हो सकती है। वहीं गर्म और उमस भरे मौसम में स्वास्थ्य संबंधी सावधानी भी जरूरी है। किसानों के लिए स्थानीय कृषि विभाग और मौसम विभाग की सलाह के अनुसार बुआई और सिंचाई योजना बनाना बेहतर रहेगा।

The Narayan Times आने वाले दिनों में मानसून की चाल, बारिश के वितरण, खेती पर असर और राज्यों की तैयारी पर लगातार नजर रखेगा।

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