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भारत ने दोहराया, सिंधु जल संधि तब तक स्थगित रहेगी जब तक पाकिस्तान आतंकवाद पर ठोस कदम नहीं उठाता
भारत ने स्पष्ट किया है कि सिंधु जल संधि तब तक स्थगित रहेगी, जब तक पाकिस्तान सीमा पार आतंकवाद के समर्थन को विश्वसनीय और स्थायी रूप से नहीं छोड़ता। यह बयान भारत-पाकिस्तान संबंधों, जल सुरक्षा और क्षेत्रीय कूटनीति के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
नई दिल्ली, 4 जुलाई 2026: भारत ने एक बार फिर स्पष्ट कर दिया है कि सिंधु जल संधि तब तक स्थगित रहेगी, जब तक पाकिस्तान सीमा पार आतंकवाद के समर्थन को विश्वसनीय और स्थायी रूप से नहीं छोड़ता। भारत का यह रुख केवल जल बंटवारे से जुड़ा मुद्दा नहीं है, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा, कूटनीतिक दबाव और क्षेत्रीय स्थिरता से भी जुड़ा हुआ है। सिंधु जल संधि दशकों से भारत और पाकिस्तान के बीच जल प्रबंधन का आधार रही है, लेकिन बदलते सुरक्षा हालात और आतंकवाद से जुड़ी चिंताओं ने इस संधि को फिर से राजनीतिक और रणनीतिक बहस के केंद्र में ला दिया है।
भारत का कहना है कि किसी भी द्विपक्षीय व्यवस्था की सफलता के लिए भरोसा सबसे जरूरी होता है। यदि एक तरफ समझौते और सहयोग की बात हो, लेकिन दूसरी तरफ सीमा पार आतंकवाद और हिंसा को समर्थन मिलता रहे, तो सामान्य कूटनीतिक संबंध बनाए रखना कठिन हो जाता है। इसी कारण भारत ने यह संकेत दिया है कि जल संधि जैसे बड़े समझौते को भी सुरक्षा वातावरण से अलग करके नहीं देखा जा सकता।
सिंधु जल संधि 1960 में भारत और पाकिस्तान के बीच हुई थी। इस संधि के तहत सिंधु नदी प्रणाली के पानी के उपयोग को लेकर दोनों देशों के अधिकार और जिम्मेदारियां तय की गई थीं। यह संधि लंबे समय तक दोनों देशों के बीच तनाव के बावजूद कायम रही। कई युद्धों, राजनीतिक संकटों और सीमा तनावों के दौरान भी यह व्यवस्था चलती रही। यही कारण है कि इस संधि को अक्सर भारत-पाकिस्तान संबंधों में स्थिरता के एक महत्वपूर्ण उदाहरण के रूप में देखा जाता था।
लेकिन भारत का ताजा रुख यह बताता है कि नई दिल्ली अब जल कूटनीति को राष्ट्रीय सुरक्षा के व्यापक ढांचे में देख रही है। भारत का मानना है कि पाकिस्तान को आतंकवाद पर केवल बयान नहीं, बल्कि ठोस और स्थायी कार्रवाई दिखानी होगी। “विश्वसनीय और अपरिवर्तनीय” कदमों की बात इसी संदर्भ में महत्वपूर्ण है। इसका अर्थ यह है कि भारत केवल अस्थायी आश्वासन या औपचारिक बयान से संतुष्ट नहीं होगा, बल्कि जमीन पर ऐसे बदलाव देखना चाहेगा जिनसे सीमा पार आतंकवाद की संरचना कमजोर हो।
पाकिस्तान की ओर से इस मुद्दे को जल के राजनीतिक इस्तेमाल के रूप में पेश किया जा सकता है, लेकिन भारत का रुख सुरक्षा आधारित है। भारत का कहना है कि आतंकवाद और समझौतों को अलग-अलग खानों में नहीं रखा जा सकता। यदि नागरिकों की सुरक्षा, सीमा की स्थिरता और आतंकवाद विरोधी कार्रवाई पर गंभीरता नहीं दिखाई जाती, तो व्यापक सहयोग की गुंजाइश सीमित हो जाती है।
इस फैसले का असर आने वाले समय में भारत-पाकिस्तान बातचीत की दिशा पर पड़ सकता है। सिंधु जल संधि का मुद्दा दोनों देशों के बीच केवल तकनीकी चर्चा का विषय नहीं रहेगा, बल्कि राजनीतिक और रणनीतिक संवाद से भी जुड़ सकता है। जल विशेषज्ञ, कूटनीतिक अधिकारी और सुरक्षा विश्लेषक अब इस बात पर नजर रखेंगे कि भारत इस स्थगन को किस तरह आगे बढ़ाता है और पाकिस्तान की ओर से क्या प्रतिक्रिया आती है।
भारत के लिए यह संदेश भी महत्वपूर्ण है कि राष्ट्रीय हित और सुरक्षा से जुड़े विषयों पर वह कठोर रुख अपनाने को तैयार है। यह रुख घरेलू राजनीति में भी चर्चा का विषय बन सकता है, क्योंकि जल, आतंकवाद और पड़ोसी देशों से संबंध जैसे मुद्दे आम जनता के बीच गहरी संवेदनशीलता रखते हैं। सरकार यह दिखाना चाहेगी कि वह आतंकवाद के मुद्दे पर किसी तरह की नरमी नहीं बरतेगी।
कुल मिलाकर, सिंधु जल संधि पर भारत का ताजा रुख भारत-पाकिस्तान संबंधों में एक महत्वपूर्ण मोड़ माना जा सकता है। यह केवल पानी का मुद्दा नहीं, बल्कि भरोसे, सुरक्षा और कूटनीतिक जिम्मेदारी का सवाल बन गया है। आने वाले दिनों में यह देखना अहम होगा कि पाकिस्तान भारत की शर्तों पर कैसी प्रतिक्रिया देता है और क्या दोनों देशों के बीच संवाद की कोई नई संभावना बनती है या तनाव और बढ़ता है।
